बुधवार, फ़रवरी 26, 2020

कर्म : ज्योतिष का आधार (Karma : The basis of Astrology)


मित्रों , पिछले लेख मे, ज्योतिष भागयवादी बनाती है या नहीं, इस विषय पर चर्चा का आरम्भ किया था | उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आज ज्योतिष के कार्मिक आधार पर बात करते हैं |

भगवत गीता मे श्री कृष्णा ने कहा कि, मनुष्य हर पल सिर्फ कर्म ही कर सकता है और कोई सत्ता उसके पास नहीं है | ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग आदि भी कर्म ही है | जिसे हम अकर्मण्यता कहते हैं वह भी कर्म है | शारीरिक क्रियाओं का  निश्चेष्ट चक्र (effortless cycle) हो या हमारे चेष्ट (efforts) कार्य सब कर्म है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात जो भगवत गीता मे श्री कृष्णा ने कही है वह आत्मा के अजर (age-less) और अमर (perpetual) गुण  के विषय मे कहा है।  आत्मा की अनंत यात्रा की संकल्पना (concept) को मुख्य्तः बताया गया है।

इन दोनों ही तथ्यों को केंद्रबिंदु मे रखकर ही हम मानव जीवन यात्रा एवं उसके इस जन्म के उद्देश्य को समझ सकते हैं।

यदि कर्म ही आधार है तो भाग्य (fate) क्या है ?

कर्म और भाग्य की संकल्पना के बीच सदा एक बहस छिड़ी रहती है।  मुझे इसका एक मुख्य कारण समझ आया वह यह कि , दोनों ही को समझने मे फेर है। भाग्य को कुछ ऐसा समझा गया कि यह कोई ऐसी जंजीर है जोकि मानव जो जकड चुकी है और उसको असहाय बना चुकी है , उसके वश मे अब कुछ भी नहीं।  वहीँ कर्म को सिर्फ और सिर्फ चेष्टा (efforts) और अनुसरण (chase) से जोड़ कर ही प्रचारित किया गया।  दोनो ही विचार विरूपित (distorted) हैं।

कहते हैं भाग्य कर्म से बनता है।  सत्य है , पर कौन से और कैसे कर्म से? उत्तर एक ही है; हर तरह के कर्म से। भाग्य कर्म का परिणाम है। कर्म चुना जा सकता और परिणाम सिक्के के दूसरे पहलु की तरह अपने आप आ जाता। चलिए इसको थोड़ा सा और समझते हैं।

आत्मा अपनी अनंत यात्रा मे अपनी प्रज्ञा (intelligence) के अनुसार चुनाव करती है क्योंकि चुनाव कर्म का आधार है।  कुछ भी करने से पहले हम यह तय करते की हमको क्या करना है।  यह चुनाव उस पल मे आत्मा की प्रज्ञा (intelligence) पर निर्भर करता है।  अतः परिणाम भी जाने अनजाने मे चुन लिया जाता।  हर कर्म के साथ ही आत्मा का आत्मबोध बढ़ता है।  मनोरंजक बात यह है कि कोई आवश्यक नहीं कि  परिणाम उस पल या उसी जन्म मे ही आ जाए।  यह आत्मा के आत्मबोध के बाद विकास पर निर्भर करेगा कि वह परिणाम भोगने के लिए कब इच्छुक है , यानि किसी भी कर्म के परिणाम तभी मिलते जब आत्मा उस परिणाम को भोगने की चेतना विकसित कर लेती है। यह परिणाम कुछ भी हो सकते हैं।  जैसे, किसी व्यक्ति के पास धन है पर कोई गरीब है। कोई अचानक बहुत अच्छे परिणाम पा जाता और कोई बहुत ज्यादा परिश्रम (hard work) ही करता रहता है पर परिणाम उस अनुपात मे नहीं आते।  कोई हमेशा अच्छा करता है पर उसके काम की आलोचना ही होती रहती है।  किसी का वैवाहिक जीवन सुखी है और किसी का द्वेष  भरा हुआ।  इस प्रकार अनगिनत परिणाम हमको देखने को मिलते। इस प्रकार अनगिनत परिणाम हमको देखने को मिलते। 

कर्म का जो चुनाव आत्मा करती और फिर उसके अच्छे बुरे परिणाम जो अपरिहार्य (inevitable) है। वह हमारे प्रारब्ध का निर्माण करता है।


तो फिर हम जन्म क्यों लेते हैं और प्रारब्ध की क्या भूमिका है ?

जैसा की ऊपर उल्लेख (mention) किया गया है की आत्मा जब चेतना के उस स्तर तक पहुँचती है जहाँ वह परिणाम को भोगने के लिए तत्पर (ready) होती है तब अपने उसके जन्म की रूपरेखा बनती है।  यह परिणाम अच्छे और बुरे दोनों हो सकते हैं।  (वैसे अध्यात्म मे अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं होता, यह सिर्फ एक दृष्टिकोण है)

इस रूपरेखा के अध्यन को ही ज्योतिष शाश्त्र के माध्यम से किया जाता है।  यानि ज्योतिष सिर्फ कर्म द्वारा बनाये गए प्रारब्ध और उस के फल जो आत्मा जीवन मे भोगेगी उसका एक विश्लेषात्मक अध्यन है।

तो फिर हमारे वश मे कुछ नहीं, यदि प्रारब्ध मे यह तय है की हम यहाँ क्या भोगेंगे, क्या यह सही है ?

इसका उत्तर सिर्फ यही है कि  यह सोंच त्रुटिपूर्ण (faulty) है। यदि हम यहाँ कुछ कर नहीं सकते तो जन्म लेने का उद्देश्य क्या है ? पिछले जन्म मे भी हम कर्म के लिए स्वतंत्र थे, इस जन्म मे एवं आगामी जन्मों मे भी हम कर्म के लिए स्वतंत्र होंगे।
और एक अच्छा समाचार यह है कि , हर जन्म मे चेतना का विकास होता है जिस से हमारी प्रज्ञा (intelligence) बेहतर होती है और, हम सही चुनाव कर पाते हैं।

यहाँ यह आवश्यक है कि हम कुछ और तथ्य समझ लें।

१. संचित कर्म : यह प्रारब्ध है जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका  है।

२. अर्जित कर्म : यह कर्म  लेने के बाद करते हैं।

३. आगामी कर्म : यह कर्म हम भविष्य मे करेंगे।

४. क्रियमण कर्म : वह कर्म जो अभी किए जा रहे हैं और इन कर्मों के फल भी शीघ्र फलीभूत हो जाते हैं।

एक और वर्गीकरण है :-

१. दृढ कर्म : यह प्रारब्ध का वह कार्मिक भाग है जो आत्मा को अवश्यम्भावी (inevitable) भोगना होगा और अपने आध्यात्मिक पाठ सीखने होंगे।  इसमे शुभ अशुभ सभी तरह की घटनाएं सम्मिलित हैं।  संसार मे इसको ही ले कर बहस है की भाग्य का लिखा कोई नहीं टाल सकता।

२. अदृढ़ कर्म : यह वह कार्मिक भाग है जो अर्जित कर्मों द्वारा प्रभावित किया जा सकता है।  इन्ही कर्मों को ज्योतिष उपाय, प्रार्थना की शक्ति एवं आध्यात्मि अभ्यास से (जिसमे चेष्टा कर्म भी आता है ) प्रभावित किया जा सकता

३. दृढादृढ़ कर्म : यह वह कर्म हैं जो इच्छा शक्ति, चेष्टा , प्रार्थना या दूसरे ज्योतिष उपाय द्वारा आंशिक रूप से प्रभावित किये जा सकते हैं। 

ज्योतिष शाश्त्र इन सभी कर्मों का अध्ययन एवं विश्लेषण करता है और, एक सच्चा ज्ञान ज्योतिषी उस विश्लेषण को सार्थकता से अपने यजमान (client) को बताता है।

आज यहीं पर विराम देता हूँ। अगले  लेख मे जन्म योजना एवं सांसारिक सम्बन्ध के विषय को लेंगे जो कर्म पर और प्रकाश डालेगा।

सप्रेम

अनुरोध  


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बुधवार, फ़रवरी 19, 2020

क्या ज्योतिष भाग्यवादी बना देती है ?


 अक्सर यह बहस सुंनने को मिल जाती है कि ज्योतिष मनुष्य को भाग्यवादी बनाती है| यह कर्म से विमुख कर के मनुष्य को गुमराह करती है|

वैसे तो हर व्यक्ति अपनी स्वयं की सोच रखने के लिए स्वतंत्र है परन्तु कोई भी सोच अधूरी,एवं त्रुटिपूर्ण जानकारी पर आधारित होती है तो  वह भ्रम पैदा करती है और, भ्रम हानिकारक होता है | ज्योतिष पर विश्वाश करना  करना एक बात है परन्तु इसको एक त्रुटिपूर्ण विषय बताना गलत है | यह वैसा ही है कि इस संसार मे कई प्रकार की पूजा एवं धर्म प्रचलित हैं और उनके अनेको अनेक अनुयायी  हैं परन्तु,यदि हमको एक विशेष धर्म या पूजा विधि का पूर्ण ज्ञान नहीं है तो उसको अवैज्ञानिक, आडम्बरपूर्ण अथवा कोई और दोष देने  लगे तो यह अन्याय होगा |

यह  लेख मेरा एक प्रयास है की ज्योतिष शास्त्र के सत्य स्वरुप को उजागर कर सकूँ | 



. क्या ज्योतिष एक विज्ञानं है ?

विकिपीडिया के अनुसार :

विज्ञान वह व्यवस्थित ज्ञान या विद्या है जो विचार, अवलोकन, अध्ययन और प्रयोग से मिलती है, जो किसी अध्ययन के विषय की प्रकृति या सिद्धान्तों को जानने के लिये किये जाते हैं। विज्ञान शब्द का प्रयोग ज्ञान की ऐसी शाखा के लिये भी करते हैं, जो तथ्य, सिद्धान्त और तरीकों को प्रयोग और परिकल्पना से स्थापित और व्यवस्थित करती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी भी विषय के क्रमबद्ध ज्ञान को विज्ञान कहते है।
(https://hi.wikipedia.org/wiki/विज्ञानं)

इस परिभाषा के अनुसार ज्योतिष शाश्त्र भी विज्ञानं की श्रेणी मे आता है क्योंकि यह भी मानव जीवन और उसके विभिन्न आयामों का अध्यन करता है| यह अध्यन एक कर्मबद्ध एवं प्रयोग आधारित व्यवस्था है और युगों के अध्धयन एवं अवलोकन के पश्च्यात इस विषय के सिद्धांत बनाये गए हैं | यह अनुसन्धान हर समय जारी है |

परन्तु यदि आप इसको किसी प्रयोगशाला मे जा कर कोई मशीन या किसी उपकरण के माध्यम से मापने का प्रयास करेंगे तो यह आपकी उस आशा पर खरा नहीं उतरेगा | जैसे , विज्ञानं यह नहीं बता सकता की सपने मे कई बार भविष्य की घटना कैसे दिखाई पड़ जाती है, जिनको हम पूर्वाभासी स्वप्न कहते हैं ? सहज बोध (intuition) क्यों होता है ? हम ऐसे कई तथ्य हैं जिनका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं दे सकते परन्तु इनको नकार नहीं सकते | ऐसे कई तथ्यों पर अनुसन्धान हुए हैं और चल रहे हैं और कुछ सिंद्धांत आदि की खोज भी चल रही है परन्तु कुछ भी प्रमाणित नहीं कर सकते, सिर्फ हम अनुभव कर सकते हैं |  

मेरा अपना मत है कि ज्योतिष शाश्त्र को हम आधुनिक विज्ञानं की परिभाषा मे गढ़ कर नहीं समझ सकते| इसको समझने के किये पहले हमको अध्यात्म के पहलु को समझना होगा,उसके बाद हमको इस ब्रह्माण्ड को एक ऊर्जा क्षेत्र के रूप में देखना होगा और, ग्रह,राशि एवं नक्षत्र आदि इस ऊर्जा क्षेत्र को किस प्रकार से प्रदर्शित करती हैं, समझना होगा |


ज्योतिष का भ्रम :

अधिकांश तार्किक व्यक्ति ज्योतिष के विषय मे समझते हैं कि  सौर मंडल के गृह लाखों किलोमीटर की दूरी से हमको किस प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं ? मेरा भी यही सोचना है | और जब आज मानव चंद्र, मंगल एवं अंतरिक्ष के सुदूर बिंदुओं तक पहुँच रहा है तो यह निर्जीव ग्रह हमको किस प्रकार प्रभावित करते हैं ?

मेरा मत :

 आध्यात्मिक रूप से हमको साकार (form) और निराकार (formless) को समझना होगा | साकार को हम अपनी इन्द्रियों द्वारा अनुभव कर सकते हैं जैसे वायु, रंग , जल, मिटटी, आदि | साकार को समय और स्पेस  मे मापा जा सकता है |

आधुनिक विज्ञानं आत्मा की अवधारणा का खंडन करता है | आत्मा को समय और स्पेस की सीमा मे मापा नहीं जा सकता | आत्मा निराकार है | निराकार समय एवं स्पेस से परे है| हर वह अवधारणा जो समय एवं स्पेस मे नहीं मापी जा सकती ,निराकार है| विज्ञानं नहीं बता सकता की जन्म पूर्व एवं मृत्यु पश्च्यात हमारा क्या होता है |

आध्यात्मिक सत्य एवं तथ्य यह है कि हम निराकार से साकार एवं वापस निराकार मे चले जाते हैं | हम साकार के माध्यम से निराकार को अनुभव करते हैं | जैसे , भोजन साकार है परन्तु उसका स्वाद निराकार है | चित्र साकार है परन्तु उसकी कला की सुंदरता निराकार है |इसी प्रकार शरीर साकार है परन्तु आत्मा निराकार है और,यह समय और स्पेस से बाहर है |
जन्म लेने का कारण साकार स्वरुप से अपने निराकार स्वरुप का ज्ञान है |

. आत्मा स्वरुप हम एक अनंत यात्रा पर हैं और पृथ्वी पर जन्म लेते हैं | यह हमारी कार्मिक यात्रा है | कर्म के विषय पर अलग से लेख लिखूंगा |
इस पूरी कार्मिक यात्रा मे हम निराकार को गहन रूप से समझ रहे हैं | और यह समझने की प्रक्रिया अनंत है |

. यह पूरा ब्रह्माण्ड ऊर्जा का स्वरुप है | हम भी इसका एक हिस्सा हैं और हम भी ऊर्जा का ही स्वरुप हैं | हमारा जन्म एवं हमारी मृत्यु दोनों घटना ऊर्जा रूपांतरण हैं | एक जन्म मे हम जो भी निराकार जीवन स्वरुप जीने आये हैं वह हमारी जींस मे हमको साकार स्वरुप मिलता है | यानि हम एक अनुपम (unique) ऊर्जा स्वरुप (energy  configuration)  हैं और यह एक ब्रह्मांडीय घटना है |

. ग्रह , राशियां एवं नक्षत्र की स्थिति  इस ऊर्जा क्षेत्र मे इस ब्रह्मांडीय घटना को प्रीतिबिम्बित करती है| जन्म की इस घटना के क्षण ग्रहों की सौर मंडल मे स्थिति जनम कुंडली मे अंकित कर ली  जाती है |

इस कुंडली के अध्ययन, और उसे सम्बंधित सिद्धांतों को स्थापित करना ज्योतिष शाश्त्र का काम है |

इस महान आध्यात्मिक विद्या के साथ कुछ कमियां रही है और वह अभी भी जारी है तभी यदा कदा इस की प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं |

. ज्योतिषी का इस विद्या का गलत तरह से जनता के सामने प्रस्तुत करना |अधिकांश ज्योतिषियों की इस शाश्त्र की समझ बहुत ही काम या गलत है | इस विद्या से लालच या डर पैदा करके लोगो को भ्रमित किया गया है |

. ज्योतिष द्वारा अबतक की गई  सही भविष्यवाणियों एवं खोजों के आकड़ों का ना होना |

. जीवन बहुत बदल गया है परन्तु अधिकांश ज्योतिष अभी भी पुराने सिद्धांतों एवं मतों पर टिके हैं| आगे इस प्रकार के सिद्धांतों पर मे लेख लिखूंगा |

तो ज्योतिष भाग्यवादी एवं अकर्मठ बनाती है?

जी हाँ ! यह भाग्य के सहारे अकर्मठ मनुष्य बनाती है अगर किसी ऐसे व्यक्ति से परामर्श ली गयी जो विषय को समझता नहीं और अधूरा  या विकृत ज्ञान के सहारे खुद भी भ्रम में है और भ्रम फैला रहा है |

ज्योतिष शाश्त्र मानव के मार्गदर्शन के लिए है |  

वर्तमान जीवन मे उसका आध्यत्मिक उद्देश्य क्या है और किस प्रकार वह उस उद्देश्य की प्राप्ति कर सकता है ,एक अच्छा ज्योतिषी भली भांति मार्ग दर्शन कर सकता है |

आज के लिए बस इतना ही मित्रों | आगे लेखों मे इस विषय मे और ज्यादा चर्चा करेंगे | कोई प्रश्न हो या कोई मत/सुझाव हो तो अवश्य दीजिये।  

अगले  लेख  में आत्मा की कार्मिक यात्रा एवं ज्योतिष की भूमिका पर बात करेंगे।  


शुभेक्षा,  

अनुरोध 

संपर्क  :
krisa.advisor@gmail.com 


चित्र सहयोग : गूगल इमेज (कॉपीराइट फ्री )

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